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क्या है मोहब्बत का ये सिला...

जब तुम मिले एक सुख मिला,
फौरन बिछड़ने का दुख मिला..

अब क्या करूँ तुमसे गिला,
जब रब ने खुद ही दिया सिला..

जो है मुझे ज़माने से अजीज़,
न मैं उसे मिली, न वो मुझे मिला..

मेरे दिल मुझे गुलज़ार कर,
क्या है मोहब्बत का ये सिला..

तुम्हें #ज़िन्दगी बना के रखा है,
अब तुम बताओ तुम्हें है क्या गिला..

प्रिया यादव

मैंने आँखों में जो तेरी.....

सूखे पत्तों की तरह पेड़ से अब झड़ने लगे हैं
तेरी यादों के वो मोती सब बिखरने लगे हैं।

मैंने आँखों में जो तेरी तस्वीर सजा रखी थी,
बन के आँसू वो मेरी आँख से बरसने लगे हैं।।

कभी बिन माँगे ही मिल जाती थी दुनिया भर की चाहत,
आज उस एक पल को जीने को हम तरसने लगे हैं।

एक तेरे छोड़ जाने से दिल का है ये आलम,
सारी दुनिया के लोग मुनाफ़िक़ लगने लगे हैं।।

कोई देखे न हमें प्यार से कह दे मोहब्बत है तुमसे,
ऐसी बातों से मेरी जान अब हम डरने लगे हैं।

कभी मिल जाओगे ख़्वाबों में ही मुलाक़ात बन के,
इसी ख़्याल से अब हम ज़रा संवरने लगे हैं।।

"प्रिया यादव"



बहुत दिन हो गया .....

बहुत दिन हो गया मैंने कुछ लिखा नही,
शायद अभी दिल तोड़ने वाला दिखा नही।
क्या करूँ कुछ नया सूझ नही रहा,
शायद अब मेरा दिल टूट नही रहा।।
बहुत दिन हो गया................

क्या कहूं स्वर उसके भी लाज़वाब थे,
आंखों को देखा तो सपनों के अरमान थे।
ख्वाब यूँ ही नही सजाया हमने उसके साथ,
हम मिले ही उस घड़ी में जो दिन लाजवाब थे।।

कुदरत ने जो दिया वो माह फ़रवरी भी याद है ,
बाबा ने दिया था एन्टी रोमियो की सौगात है।
खुदा उसको भी जन्नत दे जिसके वो कर्जदार है,
जब हम मिले थे वो घड़ी ही लाज़वाब है।।

  लवकुश यादव "अज़ल"


दिल से मोहब्बत

मैं तो खुद पन्नो में टुटा,
कोई जोड़ न सका।
मैंने तुझे बड़ी सिद्दत से,
चाहा तू मेरा हो न सका।।

ज़ख्म पुराना ही रहा मेरा,
कभी कुछ नया हो न सका।
जो भी रहा दिल में रहा,
होठो से कभी बयां हो न सका।।

यही मसला रहा ज़िन्दगी का,
जो कभी भी हल हो न सका।
मैंने तुझे बड़ी सिद्दत से,
चाहा और तू मेरा हो न सका।।

मेरी आँखों के पानी ने,
सब कुछ कह दिया ।
पर मेरा दिल जो तुझसे,
कुछ कह न सका।।

लवकुश यादव "अज़ल"

अभी बाकी है

अभी कलम उठाया है लिखना बाकी है ,
सपनों को सजाने की कोशिश है|
पूरा होने का मुकाम अभी बाकी है ,
कलम चल रही है बेहतर लिखना अभी बाकी है ||

अभी सपने की चाहत है अरमान अभी बाकी है,
आँखों से कह रहे है होंठो से कहना अभी बाकी है |
चाँद से मांग रहा हू सूरज से मांगना अभी बाकी है ,
समर में हू रण में उतरना अभी बाकी है ||
अभी कलम उठाया .................

                                                                                                                                                                                            लवकुश यादव "अज़ल"

मेरी यादों की अलमारी से

निकला एक किस्सा मेरी यादों की अलमारी से,
कहता हूं हर बात बड़ी ही खुद्दारी से।
मुमकिन नही हर बात को कहना जुबां से,
रखता हूं हर अंदाज अपनी यादों की डायरी से।।

निकला है एक किस्सा.......

हर बात को हर रात कैसे कहू चांदनी से,
                                                                                        दिल की बात कैसे कहू बेजुबान शायरी से।
अदाओ की बिजली कैसे हटाऊँ मन से,
बात निकली है दिल की कविता की गहराई से।।
निकला है एक क़िस्सा........

अभी प्यारा है जहाँ का हर एक तारा,
मेरी आँखों की पेशानी से ।
अभी तो सूरज डूबा है थोड़ी सी पेशानी में ,
निकला एक किस्सा मेरी यादों की अलमारी से।।

आज याद आ रहा है !

वो मेरी आँखों का बरसना,
वो मेरा तेरे पीछे पीछे चलना।
आज याद आ रहा है...

तुम्हारे बिन रात भर तड़पना,
तड़पने के बाद सुबह उठकर
मोबाइल उठा कर व्हाट्सएप चेक करना।
आज याद आ रहा है...

एक हसीं मुलाकात करना,
फ़िर मोबाइल से तेरी बात।
फिर चुपके से दिल का मिलना,
मिलकर के इतना जल्दी बिछड़ना।।
आज याद आ रहा है

वो तेरा बालकनी में आना
बालकनी में आके होंठो पे
थोड़ी सी मुस्कान का रखना
आज याद आ रहा है

तेरे मोबाइल का बिगड़ना
और मेरा मोबाइल का पटकना
आज याद आ रहा है

वो शाम की यादें
चांदनी वाली रात की नींदे
सुबह का सूरज और मोबाइल का खुलना
घर मे चहल पहल का रहना
आज याद आ रहा है

मम्मी की बातें पापा की डांटे
और रात रात भर की बातें
दिल की बातें संडे को रातें
आज याद आ रहा है

आँखों की तस्वीर

एक अपने आंखों से देखी तस्वीर बनानी है,
देखा है हमने उसका चेहरा रूमानी है।
दिल धड़कता है उसके नाम से आज भी,
लगता है यही मोहब्बत की आखिरी निशानी है।।

एक अपने आँखों से देखी तस्वीर बनानी है,

सजदा करना है दीदार करना है,
मोहब्बत मुझे उससे खुलेआम करना है।
अभी दूरियों में फिर से कमी करना है,
तुम मिलो न मिलो हमे तुमसे ही इश्क करना है।।

लवकुश यादव "अज़ल "

लवकुश यादव मेरी कमजोर डायरी


क्या करूँ मेरी कमजोर डायरी को,
दिल मे हसरत न बची अब शायरी को।

लिखूं किसके लिए और भेज दू किसको,
अब मैं बेचूँ कहाँ मेरी बेजुबान शायरी को।।

कहती तो सब कुछ है ये मेरी शायरी,
पर बरसती है आंखे देखकर शायरी।

क्या लिखूं कैसे लिखूं किस कलम से लिखू,
किसको दिखाऊँ मैं अपनी कमजोर डायरी।।

ख़ंजर जो अपने दिल मे रहने वालों ने चलाया,
तो किसको दिखाऊँ मैं अपनी ये डायरी।

मैं किसके लिए लिखूं मैं ये शायरी,
किसको दिखाऊँ मैं अपनी कमजोर डायरी।।

लवकुश यादव "अज़ल "


लेखनी की कलम


ऐसे नही लाल दुलारे जाते है,
दाने दाने से बच्चे पाले जाते हैं।
पेड़ के एक टहनी से बच्चे ,
गांव में झूले से बांधे जाते है।।

ऐसे ही नही लाल दुलारे जाते है....

हर बातों पर उनकी मुस्कान,
मुस्कान से घरवाले गम को भूलाते है।
हर मुश्किल की घड़ियों को,
आराम से सहन कर जाते हैं।

ऐसे ही नही लाल दुलारे जाते है....

हर बात पर यू ही नही मुस्काते हैं,
गोकुल की गलियों की याद दिलाते हैं।
मां की ममता से पुलकित हो जाते है,
पापा की गोद मे जाकर फिर से झूम जाते हैं।।

ऐसे ही नही लाल दुलारे जाते हैं

गाँव मे पेड़ के नीचे खेल दिखाए जाते है,
मुश्किल में भी जीवन खुशहाल बनाते हैं।
ऐसे ही नही गांव के बच्चे प्यारे होते हैं।

ऐसे ही नही लाल दुलारे होते हैं

लवकुश यादव "अज़ल"